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Sunday, March 10, 2019

प्रतिमा विज्ञान पर बने भोजपुर और कलियासोत के शिवलिंग

भोपाल. राजधानी के कलियासोत डैम स्थित श्री विश्वनाथ महादेव मंदिर और भोजपुर के शिवालय का निर्माण प्रतिमा विज्ञान के अनुसार किया गया है। इसमें तीनों देव के प्रतीक समाहित हैं। पुरातत्वविद और इतिहासकार मानते हैं कि पाषाण मानव सभ्यता के केन्द्र रहे भोपाल में प्राचीन काल से शिव की उपासना की जाती रही है। यहां गुफाओं में कुछ शिवलिंग ऐसे हैं, जिनमें अज्ञात प्राकृतिक स्रोतों से वर्षभर पानी आता रहता है और इसी से भगवान शिव का अभिषेक किया जाता है।
वरिष्ठ पुरातत्वविद डॉ. नारायण व्यास बताते हैं कि भोजपुर के विशाल शिवलिंग की स्थापना 11वीं सदी में राजा भोज ने की थी। विश्व में यह सबसे बड़ा शिवलिंग है। यह प्रतिमा विज्ञान पर आधारित है। इस मंदिर का सबसे निचला हिस्सा चौकोर है, जिसे ब्रह्मा का प्रतीक माना जाता है। इससे ऊपर का हिस्सा अष्टकोणीय होता है, जिसे विष्णु का प्रतीक माना जाता है। सबसे ऊपर शिवलिंग प्रतिष्ठित है, जो महादेव का प्रतीक है।


कलियासोत डैम स्थित श्री विश्वनाथ मंदिर के महंत सुनील सिंह बताते हैं कि यह मंदिर वर्ष 1986 में बांध बना रही दक्षिण भारतीय कंपनी एसआरईसी के मुखिया रेड्डी ने बनवाया था। यह अष्टकोणीय शिवालय भी प्रतिमा विज्ञान पर आधारित है। सभी शिवालयों में जलहरी का मुख उत्तर दिशा में होता है। सिर्फ उज्जैन के महाकाल मंदिर में जलहरी दक्षिणमुखी है, क्योंकि दक्षिण दिशा में यमराज का वास माना जाता है और वहां भगवान शिव ने वहां यमराज पर विजय प्राप्त की थी। डॉ. व्यास यह भी बताते हैं कि विदिशा के पास उदयगिरि की गुफाओं में 8वीं सदी के शिवलिंग प्राप्त हुए थे।
शहर में लालघाटी गुफा को वर्ष 1830 में खोजा गया था। कुछ विद्वान मानते हैं कि वर्ष 1901 में यहां शिवलिंग की स्थापना की गई, जबकि कुछ का मानना है कि वर्ष 1949 में महंत नारायणदास त्यागी ने यहां शिवलिंग की स्थापना कराई। इस मंदिर का वर्ष 1960 में विस्तार कराया गया। वर्ष 1953 में हनुमान मंदिर स्थापित किया गया। यहां शिवलिंग पर अज्ञात स्रोत से पानी हमेशा गिरता रहता है और भीषण गर्मी में भी शिवलिंग के पास पानी रहता है। केरवा डैम स्थित शिव मंदिर में भी पहाड़ों के अज्ञात स्रोत से हर समय पानी आता रहता है। इसी पानी से शिवलिंग का अभिषेक किया जाता है और महंत व श्रद्धालु इसी पानी को पीते हैं।

इतिहासकार राजकुमार गुप्ता बताते हैं कि भोपाल की सभ्यता पाषाण मानव के समय की है और महादेेव की पूजा उस समय भी की जाती थी, इसके प्रमाण मिलते हैं। उन्होंने बताया कि शिव विश्व में पूजे जाने वाले सबसे प्राचीन देव हैं। ईसा से 2500 वर्ष पूर्व मोहनजोदड़ो की सभ्यता में पशुपतिनाथ के रूप में महादेव की पूजा की जाती थी। वहीं मातृका देवी की रूप में भगवती पार्वती की पूजा होती थी। महादेव के वाहन नंदी की भी प्रतिमा यहां खुदाई में पाई गई थी। इससे स्पष्ट है कि 4000 वर्ष पहले भी महादेव, पार्वती और नंदी की पूजा की जाती थी। यहा आर्य सभ्यता में महादेव की वंदना का प्रमाण है।



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