Today and Tomorrow Live

Sunday, March 10, 2019

मौत करीब आई तो उम्रकैद से मिली रिहाई...

इंदौर@ मनीष यादव
जेल में अंतिम सांसें गिन रहे हैं कैदी को आखिरी वक्त में अपने परिवार का साथ मिल सकेगा। बताया जाता है कि हत्या के मामले में सजा काट रहे इस कैदी को मेडिकल ग्राउंड पर कल उसके परिवार के सुपुर्द किया गया। परिवार अपने पास रखकर सेवा-सुश्रुता करेगा।
सेंट्रल जेल अधीक्षक संतोष सोलंकी ने बताया कि संतोष पिता रामचंद्र सोनी निवासी गांधीनगर को कल धारा 362 के तहत रिहा किया गया। संतोष हत्या के मामले में जेल में बंद था। उसे कैंसर की बीमारी है। जेल में रहते हुए उसका इलाज कराया गया, लेकिन पिछले कुछ समय से उसकी हालत काफी खराब है और वह अपने रोज के काम करना तो दूर हिल-डुल भी नहीं पा रहा है। इसी के चलते परिवार ने हाईकोर्ट में एक याचिका लगाई थी। इस पर हाईकोर्ट ने जेल अधिकारी को 362 के तहत कार्रवाई करने के लिए निर्देशित किया था। विभाग ने इस मामले में मेडिकल बोर्ड की अनुशंसा की थी। संतोष की हालत को देखते हुए बोर्ड ने उसके किसी भी तरह का अपराध नहीं कर पाने और बीमारी में स्थिति खराब होने की रिपोर्ट दी थी। मेडिकल बोर्ड की अनुशंसा के बाद कल उसे छोड़ा गया है।

 

prisoner santosh

हत्या के मामले में पूरा परिवार ही जेल में
संतोष के साथ उसके पिता रामचंद्र लालजी और भाई श्याम जेल में बंद है। श्याम के मुताबिक अंगूठी बनाने का कामकाज है। घर पर ही कारखाना चलता है। जिसमें वह और उनका पूरा परिवार काम कर रहा है। भांजे के अपहरण के मामले में क्षेत्र के एक व्यक्ति से विवाद हुआ और इस दौरान मारपीट में उसकी मौत हो गई। इस मामले में पुलिस ने हत्या का केस दर्ज कर 10 को आरोपी बनाया था। इनमें से 8 को आजीवन कारावास की सजा हुई। इनमें से दो रिहा हो चुके हैं और दो की पहले ही मौत हो चुकी है।

100 साल के पिता और भाई ने संभाला
जेलर केके कुलश्रेष्ठ ने बताया कि संतोष करीब 2 साल से बिस्तर पर पड़ा हुआ है। उसके 100 वर्षीय पिता और भाई श्याम भी जेल में बंद हैं, जो कि उसकी देखभाल कर रहे थे। संतोष की अभी 8 साल के लगभग की सजा बाकी है, लेकिन उसकी हालत को देखते हुए जेल प्रशासन उसे छोडऩे का निर्णय लिया। उसे एक ट्यूमर हुआ था। परिजनों ने पेरोल पर ले जाकर भी इलाज कराया। शहर से बाहर भी भेजा गया था।

क्या है धारा 362
सोलंकी ने बताया कि मैनुअल में तीन धारा 361-ए 362-ए और 363 है। जिसके तहत सजा खत्म होने से पहले कैदियों को रिहा किया जा सकता है। धारा 361 में मृत्यु की स्थिति, 362 मरणासन्न स्थितियों पर मेडिकल बोर्ड अनुशंसा पर, धारा 363 में पूर्णत: विकलांग कैदी को किया किया जा सकता है, लेकिन उसकी हालत ऐसी होना चाहिए कि वह बाहर निकल कर किसी भी तरह का अपराध नहीं कर सके। करीबन एक साल के लिए उन्हें छोड़ा जाता है। अगर इस दौरान कैदी की मौत हो जाए तो ठीक है, लेकिन अगर उसकी स्थिति में सुधार होता है और ठीक हो जाता है तो उसे वापस जेल में पहुंचा दिया जाएगा, नहीं तो एक बार फिर से मेडिकल बोर्ड की अनुशंसा पर उसके लिए रिहाई बढ़ा दी जाएगी।

2010 में हुई थी रिहाई
कुलश्रेष्ठ ने बताया कि इससे पहले 2010 में इस तरह की रिहाई की गई थी। आजीवन कारावास के कैदी पूजा पिता छगन को बीमारी के चलते छोड़ा गया था। उसकी रिहाई के 9 साल बाद अब किसी दूसरे कैदी को मेडिकल ग्राउंड के आधार पर छोड़ा गया है।



from Patrika : India's Leading Hindi News Portal https://ift.tt/2J4Q8ot

No comments:

Post a Comment

Pages